रिंगनोद क्षेत्र के गोमुख धाम में गूंजे पारंपरिक सुर: जनजाति विकास मंच ने आयोजित की बड़वा गायन प्रतियोगिता, 7 दलों ने दी प्रस्तुति, विलुप्त होती धरोहर को सहेजने की अनूठी पहल

रिंगनोद। प्राकृतिक छटाओं और सघन वनों के बीच बसे अति प्राचीन गोमुख धाम हनुमान मंदिर उण्डेढ में जनजाति विकास मंच द्वारा द्वितीय वर्ष बड़वा गायन प्रतियोगिता का भव्य आयोजन किया गया। इस प्रतियोगिता में जिले के विभिन्न अंचलों से आए 7 से अधिक बड़वा दलों ने पूरे उत्साह के साथ सहभागिता की। मंच द्वारा उपस्थित बड़वाओं का पुष्पहार पहनाकर स्वागत किया गया तथा सभी दलों को प्रोत्साहन राशि भेंट कर सम्मानित किया गया।

विलुप्त होती धरोहर को सहेजने की अनूठी पहल –
आयोजन का मुख्य उद्देश्य जनजाति समाज की सदियों पुरानी पारंपरिक बड़वा गायन कला को पुनर्जीवित करना है, जो आधुनिकता की दौड़ में धीरे-धीरे विलुप्त हो रही थी। इस मंच के माध्यम से क्षेत्र के बड़वा दलों को एकजुट कर अपनी समृद्ध लोक संस्कृति और गायन कला को प्रदर्शित करने का अवसर मिला।

दिव्य आस्था का केंद्र है गोमुख धाम –
गोमुख धाम हनुमान मंदिर एक अत्यंत प्राचीन और चमत्कारी तीर्थ स्थल माना जाता है, जहाँ मन्नतें पूरी होने की गहरी जन-आस्था है। मान्यता के अनुसार, यहाँ प्राकृतिक रूप से गाय के मुख से दुग्ध धारा प्रवाहित होती थी, जिसके चलते इस पवित्र स्थल का नाम गोमुख धाम पड़ा। पूर्व में यहाँ चैत्र नवरात्रि की अमावस्या पर हजारों श्रद्धालु व बड़वा स्नान करने, अनुष्ठान करने और नए बड़वा तैयार करने पहुंचते थे। कुछ समय से बाधित रही इस परंपरा को अब पुनः गति मिल रही है।

सनातन की रीढ़ है जनजाति संस्कृति –
दिवासा से शुरू होकर जवारा नौरता तक चलने वाली यह बड़वा परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है। इसमें गीतों के माध्यम से कुलदेवी-देवताओं, प्रकृति और पूर्वजों का आह्वान किया जाता है। सत (भार/देव शक्ति) के संचार के दौरान कालिका माता (पावागढ़), खेड़ापति हनुमान, रानी काजल, लक्ष्मी माता, भैरु बाबा, बाबा देव और धरती माता की स्तुति की जाती है। खास बात यह है कि बिना किसी औपचारिक स्कूली शिक्षा के भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह समृद्ध आध्यात्मिक ज्ञान मौखिक रूप से प्रवाहित होता आ रहा है, जो यह सिद्ध करता है कि जनजाति समाज अनादि काल से सनातन परंपरा की मजबूत रीढ़ रहा है।

वरिष्ठजनों ने किया संस्कृति संरक्षण का आह्वान –
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जनजाति विकास मंच के जिलाध्यक्ष अरविंद डावर ने कहा कि हमें अपने पूर्वजों की परंपराओं, संस्कृति, रीति-रिवाजों और त्योहारों को कभी भूलना नहीं चाहिए। यह धरोहर ही हमारे समाज की वास्तविक पहचान है और इसे सहेजना हम सबका दायित्व है।

वहीं मंच के राम प्रकाश मछार ने अपने संस्मरण साझा करते हुए बताया कि तीन पीढ़ियों पहले, जब आवागमन के साधन नहीं थे, तब भी श्रद्धालु मीलों पैदल चलकर चैत्र अमावस्या पर यहाँ पहुंचते थे। युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़े रखने के लिए ऐसे आयोजनों को भविष्य में और भी बड़े स्तर पर आयोजित किया जाना चाहिए।

प्रमुख पदाधिकारियों की रही उपस्थिति –
इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभाग प्रचारक दिनेश तेजरा, प्रमुख विजय शाह, जनजाति विकास मंच के जिला उपाध्यक्ष धनसिंह सोलंकी, युवा प्रमुख केशव बघेल, सह कर्मचारी प्रमुख सत्यनारायण मावी, रामकिशन बबेरिया, सुखराम पग्गी तथा शंकर परमार सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे। उक्त जानकारी जनजाति विकास मंच के जिला मीडिया प्रमुख दिलीप मछार द्वारा दी गई।

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