राजगढ़। शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व पर नगर के प्रसिद्ध पांच धाम एक मुकाम माताजी (बावड़ी) मंदिर में विराजित मां कामाख्या देवी के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। रविवार अष्टमी तिथि पर खुले गर्भगृह के पट सोमवार को नवमी के दिन सूर्यास्त तक दर्शनार्थियों के लिए खुले रहे। इस दौरान राजगढ़ सहित आसपास के क्षेत्रों से पहुंचे 5 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने मां कामाख्या के दर्शन कर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद लिया। सूर्यास्त के पश्चात विधि-विधान से गर्भगृह के पट बंद कर दिए गए। अब भक्तों को गर्भगृह में मां के दर्शन का यह दुर्लभ अवसर आगामी चैत्र नवरात्रि की अष्टमी और नवमी तिथि पर ही प्राप्त होगा।
सोमवार को सूर्योदय के साथ ही मंदिर परिसर में दर्शनार्थियों का तांता लगना शुरू हो गया था, जो पूरे दिन अनवरत जारी रहा। श्रद्धालुओं की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए मंदिर पर सुव्यवस्थित कतार की व्यवस्था की गई, जिससे श्रद्धालुओं ने सहजता से दर्शन किए।
30 वर्षों की कठोर साधना के बाद शुरू हुई थी परंपरा –
मंदिर के ज्योतिषाचार्य श्री पुरुषोत्तम भारद्वाज ने बताया कि करीब आठ दशक पूर्व ब्रह्मलीन पंडित मुरलीधर भारद्वाज ने इस पावन स्थल पर मां कामाख्या की लगभग 30 वर्षों तक कठोर साधना की थी। उस दौर में गर्भगृह के पट आम जन के लिए नहीं खोले जाते थे। बाद में माता के आदेश और श्रद्धालुओं की अगाध श्रद्धा को देखते हुए वर्ष में केवल दो बार शारदीय एवं चैत्र नवरात्रि की अष्टमी व नवमी तिथि पर गर्भगृह के पट खोलने की परंपरा शुरू हुई।

घने जंगल में हिंसक जीवों के बीच की थी तपस्या –
श्री भारद्वाज के अनुसार, 80 वर्ष पहले यह संपूर्ण क्षेत्र घने जंगलों से घिरा हुआ था और यहां हिंसक वन्यजीव विचरण करते थे। ऐसी विषम परिस्थितियों में ब्रह्मलीन पंडित मुरलीधर भारद्वाज ने यहां जप-तप कर सिद्धि प्राप्त की थी, जिससे यह भूमि एक जाग्रत साधना स्थली बन गई।
सामान्य दिनों में भक्तों को मंदिर के ऊपरी भाग में स्थापित प्रतिमा के दर्शन होते हैं, जबकि नवरात्रि की अष्टमी और नवमी पर सीधे गर्भगृह में विराजित मूल स्वरूप के दर्शन का सौभाग्य मिलता है। यही कारण है कि स्थानीय क्षेत्रों के अलावा अन्य राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं।


















